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मैं चाहता हूं कि मेरे देश की बेटियां अब गुड़िया नहीं, कलम और किताब मांगें

कैसे हैं साथियों? बहुत दिनों से मैं आपके बीच एक बात रखना चाहता था। इसके लिए मैंने कई बार इरादा किया और कई बार बदला। मैंने इरादा इसलिए बदला, क्योंकि मैं सोच रहा था कि कहीं मेरा मखौल तो नहीं उड़ाया जाएगा! आखिरकार मैंने तय किया कि यह बात कहनी चाहिए। यदि इसके एवज में मेरा मखौल उड़े तो उसके लिए मैं तैयार हूं। आज मैं आपको मेरे जीवन की एक घटना बताना चाहता हूं। शायद 2004 या उससे कुछ पहले की बात है। मैं मेरे गांव कोलसिया के जिस राजकीय विद्यालय में पढ़ता था, वहां एक छोटी लाइब्रेरी भी थी। मैं वहां से एक किताब लेकर आया जिसमें बहुत ही खूबसूरत कहानी थी। कहानी कुछ इस तरह थी कि किसी देश में एक बच्चा बेहद मुश्किल हालात में पढ़ाई कर रहा था। उसकी आर्थिक स्थिति बहुत खराब थी। किताबें खरीदने के लिए पैसे नहीं थे। सर्दियों का मौसम उसे बहुत परेशान करता था क्योंकि जो इकलौता पुराना कोट वह पहना करता, कई जगहों से फट चुका था। बहुत मुश्किल हालात में भी उसने इरादा नहीं बदला। अध्ययन के प्रति उसका रुझान कम नहीं हुआ। उसे तकलीफ में देख एक औरत ने उसकी मदद करनी चाहिए। एक रोज वह ​कुछ किताबें और कुछ रकम (शायद 20 डॉलर...

संस्थापक के बारे में

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नाम: राजीव शर्मा जन्म: 6 अगस्त, 1987  ज्यादातर स्कूली शिक्षा कोलसिया (झुंझुनूं-राज.) के राजकीय विद्यालय से प्राप्त की। साल 2000 में कुछ किताबों के साथ पुराने घर में लाइब्रेरी की शुरुआत। 2005 में एक सड़क दुर्घटना के बाद नेचुरोपैथी का अध्ययन तथा स्वयं पर इसके प्रयोग।  24 वर्ष की उम्र में एक राष्ट्रीय पत्रिका में नेचुरोपैथी पर नियमित कॉलम लेखन। हिंदू, जैन और इस्लाम धर्म की शिक्षाओं का मारवाड़ी में अनुवाद।  क़ुरआन का मारवाड़ी में अनुवाद, जिसे भारत सहित पाकिस्तान, बांग्लादेश, आॅस्ट्रेलिया, अमेरिका, सऊदी अरब, यूएई, ब्रिटेन, इराक, नाइजीरिया, श्रीलंका, तुर्की आदि में बहुत सराहा गया। अनेक विद्यार्थियों को सुंदर हस्तलिपि (हैंडराइटिंग) का प्रशिक्षण।  प्रस्तुति : आकाश

The Old Ink Library की शुरुआत कैसे हुई?

नमस्कार साथियो! मेरा नाम राजीव शर्मा है। The Old Ink Library के इस ब्लॉग पर मैं आपका स्वागत करता हूं। आकार और संसाधनों के मामलों में यह एक छोटी लाइब्रेरी है लेकिन हमारा मकसद यकीनन बड़ा है। वह है — यह दुनिया हमें जिस रूप में मिली है, उसे और सुंदर और बेहतर जगह बनाना।  साल 2000 की सर्दियों में कुछ किताबों और बिना किसी नाम के इसकी शुरुआत मैंने एक छोटे-से कमरे में की थी। तब से अब तक बहुत कुछ बदल चुका है लेकिन मैं मानता हूं कि कुछ चीजें वक्त बदलने के बावजूद कभी नहीं बदलतीं। शिक्षा का उजाला एक ऐसी ही शक्ति है।  मैंने इसकी स्थापना मेरे गांव कोलसिया में की थी जो राजस्थान के झुंझुनूं जिले में स्थित है। अब मैं लाइब्रेरी को नए रूप में पेश कर रहा हूं, जिसमें इंटरनेट की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण होगी, ताकि यह उन लाखों बच्चों तक भी पहुंच सके जिनके बस्तों में कॉपी-किताबें, पेंसिल के छिलके, रबर के टुकड़े और फिरकी के अलावा ढेरों सपने कैद हैं।  इस लाइब्रेरी के नामकरण के पीछे भी एक दिलचस्प कहानी है। स्कूली पढ़ाई के दौरान हमारे अंग्रेजी के शिक्षक श्री सरदार सिंहजी इस बात पर खास ...